शब्‍द विमर्श कड़ी चालीसवीं : प्रदूषण

17 फरवरी

शब्‍द विमर्श कड़ी चालीसवीं :

प्रदूषण

भक्‍तगण प्रसन्‍न रहें और सुविचारों से समृद्ध हों तथा धार्मिक दोहन से बचे रहें तथा विचारों के दोहन में जुटे रहें।


एक आवश्‍यक सूचना :
अविनाश वाचस्‍पति ऊर्फ अन्‍नास्‍वामी का एक स्‍वतंत्र हिंदी चिट्ठा (ब्‍लॉग) ‘शब्‍द विमर्श’ के नाम से उपलब्‍ध है। यह आज की ताजा कड़ी है। वैसे इसमें फेसबुक की अब तक की सभी कडि़यों को भी प्रकाशित किया जाएगा। जिससे फेसबुक पर जिनका खाता नहीं है, वे भी और जिनका खाता है वे भी, मतलब सब वहां …और यहां पर आकर इन प्रवचनों/विमर्श का …………लाभ ले पाएंगे। विमर्श दोनों ही स्‍थलों पर जारी रहेगा।
फेसबुक महात्‍मय पुस्‍तक का एक तिहाई अंश तैयार है। इसे भी संशोधित किया जाएगा फिर भी अगर आप जानना चाहते हैं कि उनमें किन साथियों की टिप्‍पणियों को शामिल किया गया है तो एक ई मेल भेजें।

अन्‍नास्‍वामी प्रवचन श्रंखला की चालीसवीं कड़ी :

आज ‘शब्‍द विमर्श’ की यह कड़ी अपने उनतालीसवें पड़ाव पर पहुंच चकी है। यदि आप इस बारे में कुछ कहना चाह रहे हैं तो अवश्‍य कहें, मैं आपके विचारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हूं।

‘शब्‍द विमर्श’ कड़ी चालीसवीं :

प्रदूषण

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4 Responses to “शब्‍द विमर्श कड़ी चालीसवीं : प्रदूषण”

  1. anju(anu0 फ़रवरी 18, 2012 at 4:02 पूर्वाह्न #

    देखो जल प्रदूषण की ऐसी मार हैं पड़ी
    हो बनारस का घाट,या हो गंगा नदी ,
    खतरनाक स्तर तक हैं ये दूषित ,
    घाट तक आते आते ,
    पहले ही काफी
    प्रदूषित हो जाती |

    गली गली हो या कोई सड़क
    गाड़ियों की रेलमपेल हैं लगी
    छोडती धुयाँ …और आवाज़ का हैं
    अगल से शोर बहुत …
    ध्वनि प्रदूषण से सारी जनता
    हैं त्रस्त बड़ी |

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 18, 2012 at 10:54 पूर्वाह्न #

      अंजु जी, प्रदूषण को सिर्फ सृष्टि से जुड़ी चीजों तक मानना और उससे हुए नुकसान को आंकना एक सीमित दायरा है। आज जहां तक नजर जाती है, प्रदूषण की मार सब तरफ पसरी नजर आती है। यह वह प्रदूषण है जिसे हम सब जानते हैं, मानते हैं और इसमें जान बूझकर अपना गलत सहयोग भी करते हैं कुछ धर्म के नाम पर और कुछ धंधे के नाम पर। धर्म के नाम का प्रदूषण, उन्‍हें फैलाने वालों के लिए कमाई का धंधा है और वाहनों का प्रदूषण तो आजकल सरकारों के लिए भी कमाई का धंधा बन गया है जिसकी छोटी सी मिसाल यह है कि पच्‍चीस तीस रुपये में तीन महीने के लिए की जाने वाले प्रदूषण जांच, एकदम से बिना किसी घोषणा के बढ़ाकर 60 और अस्‍सी रुपये प्रति तिमाही कर दी है । यह सब कानून के नाम पर की जाने वाली कमाई है क्‍योंकि हम जानते हैं कि यह भी सिर्फ जेब भरने का माध्‍यम बन गई है। गंगा की शुद्धि के नाम पर भी खूब धन डकारा जाता है। काम तो किया ही नहीं जाता या किया जाता है तो सिर्फ खबरों में नजर आता है।
      पर आज चिंता का विषय वैचारिक प्रदूषण है। घरों में हम लोग परिवार में यार, साला इत्‍यादि का बेधड़क इस्‍तेमाल कर रहे हैं। इसके अतिरिक्‍त टी वी और फिल्‍मों में खूब द्विअर्थी गीत व संवादों के जरिए प्रदूषण से सबके दिमाग जाम कर रहे हैं। इसका फैलाव तो दिनोंदिन खूब तेजी से हो रहा है और हम सब इसके माध्‍यम बने हुए हैं। इससे जो नुकसान हो रहा है, उसकी तो भरपाई कभी नहीं हो सकती। हमारी आने वाली संतानें इसका दुख झेलती रहेंगी जबकि यह इन्‍हें आनंद ही देता दिखाई पड़ता है लेकिन सब जानते हैं कि जो हानि इससे हो रही है, वह सबसे अधिक चिंताजनक है। इसी प्रकार प्रदूषण के और भी अनेक क्षेत्र हैा जो नेक सृष्टि का विनाश करने पर लगे हुए हैं और हम चाहकर भी इन्‍हें रोक नहीं पा रहे हैं और इनके विकास में चाहे अनचाहे भागीदार बन रहे हैं।
      शब्‍द विमर्श जो भाषाई प्रदूषण के निवारण में काफी उपयोगी साबित हो सकता है। विडंबना देखिए इस पर अपनी राय देने से भी हम बच रहे हैं। इस पर अभी तो सिर्फ चर्चा ही करनी है, तब भी सबकी उदासीनता चिंतनीय है। अगर सक्रिय होकर इसमें भाग लेने की बात आए तो शायद दूर दूर तक कोई नजर न आए और यह भी होसकता हैकि खूब लोग जुट जाएं।

  2. संतोष त्रिवेदी फ़रवरी 19, 2012 at 2:31 पूर्वाह्न #

    बाहरी प्रदूषण से कहीं खतरनाक मानसिक-प्रदूषण होता है !

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 19, 2012 at 12:18 अपराह्न #

      इसमें बिल्‍कुल भी संशय की बात नहीं है, हम रोजमर्रा की घटनाओं में देख ही रहे हैं। कहीं यातायात जाम के नाम पर मारपीट, कहीं जीतने के नाम पर, कहीं छूटने के नाम पर, कभी बचने के नाम पर, मानसिकता प्रदूषण का स्‍तर टीवी चैनलों, मोबाइल शार्ट संदेशों के जरिए, युवाओं की आपसी बातचीत (अ‍ब तो परिवार भी इनकी चपेट में आ गए हैं) ने मानसिकता दूषित कर के रख दी है और अध्‍यापकगण जो इससे निजात दिलाते थे, अब अधिकारधारक ही नहीं रहे हैं। मजबूर हैं, सिर्फ देख रहे हैं और देखने के सिवाय सकारात्‍मक करने में अपने को बेबस पा रहे हैं। जहां देखों वहां प्रदूषण है, हर ओर छाए हुए विनाश के क्षण हैं संतोष जी।

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