शब्‍द विमर्श की उनतालीसवीं कड़ी : बेरुखी

16 फरवरी

शब्‍द विमर्श कड़ी उनतालीसवीं :

बेरुखी

भक्‍तगण प्रसन्‍न रहें और सुविचारों से समृद्ध हों तथा धार्मिक दोहन से बचे रहें तथा विचारों के दोहन में जुटे रहें।


एक आवश्‍यक सूचना :
अविनाश वाचस्‍पति ऊर्फ अन्‍नास्‍वामी का एक स्‍वतंत्र हिंदी चिट्ठा (ब्‍लॉग) ‘शब्‍द विमर्श’ के नाम से उपलब्‍ध है। यह आज की ताजा कड़ी है। वैसे इसमें फेसबुक की अब तक की सभी कडि़यों को भी प्रकाशित किया जाएगा। जिससे फेसबुक पर जिनका खाता नहीं है, वे भी और जिनका खाता है वे भी, मतलब सब वहां …और यहां पर आकर इन प्रवचनों/विमर्श का …………लाभ ले पाएंगे। विमर्श दोनों ही स्‍थलों पर जारी रहेगा।
फेसबुक महात्‍मय पुस्‍तक का एक तिहाई अंश तैयार है। इसे भी संशोधित किया जाएगा फिर भी अगर आप जानना चाहते हैं कि उनमें किन साथियों की टिप्‍पणियों को शामिल किया गया है तो एक ई मेल भेजें।

अन्‍नास्‍वामी प्रवचन श्रंखला की उनतालीसवीं कड़ी :

आज ‘शब्‍द विमर्श’ की यह कड़ी अपने उनतालीसवें पड़ाव पर पहुंच चकी है। यदि आप इस बारे में कुछ कहना चाह रहे हैं तो अवश्‍य कहें, मैं आपके विचारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हूं।

‘शब्‍द विमर्श’ कड़ी उनतालीसवीं :

बेरुखी

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4 Responses to “शब्‍द विमर्श की उनतालीसवीं कड़ी : बेरुखी”

  1. संतोष त्रिवेदी फ़रवरी 16, 2012 at 9:12 अपराह्न #

    किसी की बेरुखी किसी की जान भी ले सकती है,इसलिए handle with care !

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 17, 2012 at 8:52 पूर्वाह्न #

      कहने को उसकी ओर रुख नहीं किया जाता पर यह रुख न करना यानी ध्‍यान न देना, सबसे अधिक दुख देता है। दुख जान नहीं लेता बल्कि तपा कर संघर्षशील बनाता है। अपनों की बेरुखी जीवन बदल सकती है, जीवन को नई मंजिल तक पहुंचने के लिए तैयार करती है। बेरुखी सदा ही जान नहीं लेती। अपनी खुद की बेरुखी ही जानलेवा होती है। यदि हम अपने दुख से बेरुखी अपना लें मतलब ध्‍यान तो रखें पर उससे अपना नुकसान न होने दें। सावधानी तो प्रत्‍येक वस्‍तु में आवश्‍यक है। यह तो सनातन सत्‍य है। जहां जरा सी लापरवाही की, वहीं पर नुकसान हो जाता है। पहले तो लापरवाही न हो, ऐसी सतर्कता बरती जाए। दूसरा कभी दोहराई न जाए। बेरुखी को कभी जीवन पर हावी न होने दें। बेरुखी से मुकाबला करते हुए जीवन का जो आनंद मिलता है, उसमें जितना संतोष मिलता है, उतना अन्‍य किसी जीवन के पक्ष में नहीं। इसलिए संतोष जी घबराएं मत जो बेरुखी नजर आ जाए, उसे अनदेखा करते हुए, उससे सदैव सावधान रहें।

  2. anju(anu) फ़रवरी 17, 2012 at 12:57 पूर्वाह्न #

    उनकी बेरुखी का आलम
    तो देखो ए सनम
    कि वो लांघ गए भीनी सी
    दीवार मेरे विश्वास की ,
    उसने ,खुद को दाता तो
    मान लिया
    पर मुझे ,खुद में
    दीन भी ना रहने दिया |

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 17, 2012 at 8:58 पूर्वाह्न #

      अंजु जी, जिसे आप बेरुखी का आलम बतला रही हैं, वह दरअसल धूर्तता है। धूर्त व्‍यक्ति सोचता है कि वह जो कर रहा है, सामने वाले को उसका भान नहीं है। और जब सामने वाले को भान नहीं होता, उस समय वह अति विश्‍वास करके लापरवाह हो चुका होता है। उस समय धूर्तता कामयाब हो जाती है। विश्‍वास टूट जाता है। विश्‍वास तोड़ने वाला दाता तो हो ही नहीं सकता, जो विश्‍वास नहीं दे सकता, उससे और कुछ पाना असल में पाना नहीं खोना ही है। दीन मत बनो, संघर्ष करो, अत्‍याचार और दगाबाजी के विरोध में डट जाओ। चाहे जान चली जाए पर उसे इस काबिल मत छोड़ें कि वह दोबारा से अपना घिनौनापन किसी के प्रति इस्‍तेमाल कर सके। वह जिंदा तो रहे पर मरने से बदतर हो जाए। जिसका विश्‍वास कायम नहीं रहता, वह मौत से भी घृणित माना जाता है। विश्‍वास की दीवार को कभी झीनी भीनी न रहने दो। उसे इतना मजबूत बनाओ कि उसमें से आर पार तो दिखलाई दे परंतु वह उस देखे गए का लाभ न उठा सके। विश्‍वास का न मिलना ही बेरुखी है। इस बेरुखी और संतोष भाई की बेरुखी दो अलग अलग अर्थों में प्रयुक्‍त हुई है। इसी प्रकार प्रत्‍येक शब्‍द के काल और परिस्थिति के अनुसार मायने बदल जाते हैं। उन्‍हें जानने स्‍वीकारने की प्रक्रिया ही है शब्‍द विमर्श।

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