शब्‍द विमर्श अड़तीसवीं कड़ी : मन

15 फरवरी

शब्‍द विमर्श कड़ी अड़तीसवीं :

मन

भक्‍तगण प्रसन्‍न रहें और सुविचारों से समृद्ध हों तथा धार्मिक दोहन से बचे रहें तथा विचारों के दोहन में जुटे रहें।


एक आवश्‍यक सूचना :
अविनाश वाचस्‍पति ऊर्फ अन्‍नास्‍वामी का एक स्‍वतंत्र हिंदी चिट्ठा (ब्‍लॉग) ‘शब्‍द विमर्श’ के नाम से उपलब्‍ध है। यह आज की ताजा कड़ी है। वैसे इसमें फेसबुक की अब तक की सभी कडि़यों को भी प्रकाशित किया जाएगा। जिससे फेसबुक पर जिनका खाता नहीं है, वे भी और जिनका खाता है वे भी, मतलब सब वहां …और यहां पर आकर इन प्रवचनों/विमर्श का …………लाभ ले पाएंगे। विमर्श दोनों ही स्‍थलों पर जारी रहेगा।
फेसबुक महात्‍मय पुस्‍तक का एक तिहाई अंश तैयार है। इसे भी संशोधित किया जाएगा फिर भी अगर आप जानना चाहते हैं कि उनमें किन साथियों की टिप्‍पणियों को शामिल किया गया है तो एक ई मेल भेजें।

अन्‍नास्‍वामी प्रवचन श्रंखला की अड़तीसवीं कड़ी :

आज ‘शब्‍द विमर्श’ की यह कड़ी अपने अड़तीसवें पड़ाव पर पहुंच चकी है। यदि आप इस बारे में कुछ कहना चाह रहे हैं तो अवश्‍य कहें, मैं आपके विचारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हूं।

‘शब्‍द विमर्श’ कड़ी अड़तीसवीं :

मन

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8 Responses to “शब्‍द विमर्श अड़तीसवीं कड़ी : मन”

  1. Aar Ravi फ़रवरी 15, 2012 at 6:24 अपराह्न #

    तू मन सै भावै, मूंड हिलावै
    मन को बाचे मन ना भावै

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 15, 2012 at 6:56 अपराह्न #

      रवि जी, मन की महिमा को कोई नहीं पा सका है। जिसने पा लिया उसने अपना फेस निखार लिया है। फेसबुक को ही लीजिए ‘पूछता है आपके मन में क्‍या है’ मतलब जुकेरबर्ग ने इस रहस्‍य को जाना, इस पर अमल किया और सफलता पा ली। सफलता भी जो आम न होते हुए भी आम से अधिक मिठास भरी है। सब चाहते हैं ऐसी सफलताएं मिलें। यह सब मन की चाहना है। सबका मन सफल होना चाहता है परंतु जो दूसरों की सफलता में अपनी सफलता देखते हैं, उन्‍हें मन पर विजय हासिल हो चुकी होती है। मन को जीतने के बाद अन्‍य किसी को जीतना शेष नहीं रह जाता है। मन से जो पार पा गया, वह मन के पार आ गया। मन से पार आना, सचमुच में पार आना नहीं, अपितु मन में समाना ही है, उसमें रच बस जाना ही है।

  2. काजल कुमार फ़रवरी 15, 2012 at 6:45 अपराह्न #

    इस जैसा उद्दण्डी कोई नहीं ☺

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 15, 2012 at 7:02 अपराह्न #

      काजल जी, माना कि मन उद्दण्‍डी है परंतु इसको काबू करने की हमारे मन में ही एक डण्‍डी है, इसे अंकुश तो नहीं कहेंगे परंतु इससे हम मन को अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप कंट्रोल तो कर ही सकते हैं बल्कि करना ही चाहिए। मन चाहे कितना ही बदमाश हो परंतु वह सच्‍चे मनधारकों के साथ कभी कुटिलता से पेश नहीं आता है। यह तो मानवीय वृत्ति मन की दिशा को संचालित करती है। मन की करतूतों और कारनामों के लिए हम ही जिम्‍मेदार हैं। हमने ही मान लिया है कि मन दो होते हैं, कमजोर मन सच्‍चाई की ओर खींचता है जबकि मजबूत मन अपनी बदमाशी के चलते बुराईयों की ओर। हैरानी की बात है सर्वाधिक मामलों में सफलता बदमाश के मन के कुटिल इरादों को मिलती है। फिर उसके समर्थन में हम कितने ही तर्क गढ़ लेते हैं जबकि हम अच्‍छाई और सच्‍चाई की ओर प्रवृत्‍त रहते तो हमारी ऊर्जा अन्‍य उचित कार्यों में उपयोग में आती। मन की अपनी गति नहीं है, उसे तो हम अपने माहौल और इरादों से सदृगति और दुर्गति प्रदान करते हैं जबकि हम उसे सामान्‍य तौर पर संचालित होने दें तो भी काफी ऊर्जा हमारी सकारात्‍मक कार्यों में लग सकेगी।
      अब इस नए माध्‍यम को ही लीजिए, इससे मन भ्रमित भी हो रहा है बल्कि अधिकतर तो इससे भ्रमित ही हो रहे हैं परंतु इससे सकारात्‍मक दिशा पाने वाले और इसे विवेक के अनुसार उपयोग करने वालों की भी कमी नहीं है। इसे तो आप मानेंगे ही।

  3. संतोष त्रिवेदी फ़रवरी 15, 2012 at 7:39 अपराह्न #

    hamara mann hamare vash me nahin hota isiliye hame kasht aur dukh milta hai !

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 16, 2012 at 8:07 पूर्वाह्न #

      मन की यही कारगुजारियां तो मन को मन का दर्जा देती हैं। वैसे अपना दिल भी अपने बस में नहीं होता है संतोष भाई। मन और दिल की बेबसी ही बहुत कुछ रचनात्‍मक हमसे रचना करवा लेती है या हम करने को विवश हो जाते हैं। मान लीजिए मन होता ही न, सिर्फ दिल ही होता या दिल न होता सिर्फ मन ही होता। फिर क्‍या होता, इन सब कल्‍पनाओं की उड़ान आयोजित करने के लिए कवि और कवयित्रियों को मुस्‍तैद किया गया है। आप यह मत सोचिए कि सब अपने आप हो जाता है। अगर सब अपने आप हुआ करता तो फिर न मन की, न मानस की और न दिल की जरूरत रहती और करने की जरूरत भी नहीं रहती।
      वैसे एक सच्‍चाई और बतला दूं संतोष जी, अगर मन बस में रहा करता तो शायद कष्‍ट अधिक ही मिला करते क्‍योंकि यह दुख सालता कि हमने तो अपना मन भी अपने अनुसार संचालित किया परंतु फिर भी कष्‍ट मिला। कोई मित्र रुष्‍ट हुआ, किसी दुष्‍ट को सफलता मिली। आपके बस में तो आपकी नींद भी नहीं है, क्‍या आप कभी भी चाहें तो सो सकते हैं। गहरी नींद ले सकते हैं, नहीं न और चाहें तो भी जागे नहीं रह सकते, आपको बिना लालच के भी सोना लेना ही होगा। मिलते दुख को आप रोक नहीं सकते। जाते सुख को आप पकड़ कर बांध नहीं सकते। फिर तो आप सदा दुखी ही रहेंगे कभी दुख के आने और कभी सुख के जाने को लेकर। आप निर्लिप्‍त हो जाइए, आप अपने कार्य में जुटे रहिए। मन, मानस और दिल तथा अन्‍य सभी को अपने अपने कार्यों में संलग्‍न रहने दीजिए। फिर देखिए जो आनंद मिलेगा, फिर आपके मन में अन्‍य किसी आनंद की चाह शेष नहीं रह जाएगी और यहीं पर सारी बेबसी भी उड़न छू हो जाएगी।

    • anju(anu) फ़रवरी 16, 2012 at 8:45 पूर्वाह्न #

      मन काहे को तू
      बेचैन हैं इतना
      क्या कहते ,
      क्योंकर कहते
      एक हर्फ न निकला
      ओंठों से
      और आँखों में
      आँसू भी आ गए …|

      • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 16, 2012 at 8:29 अपराह्न #

        मन की बेचैनी सदा इंसान की रचनात्‍मकता को सक्रिय रखती है अंजू जी। मन अगर बेचैन न हो तो सारी रचनात्‍मकता और सकारात्‍मकता इंसान की उड़न छू हो जाए। हर्फ तो तब भी नहीं निकलेंगे और न उद्गार कलम के जरिए कागज अथवा कंप्‍यूटर पर आकर मोहित करेंगे। विचार अपने भाते हैं और जब अन्‍य किसी से भी विचारों की साम्‍यता मिलती है तो ओंठ और आंसू सक्रिय हो उठते हैं। आंखों में आंसू आना किसी सूनामी को लाना नहीं है। जब विचार सच्‍चे हों तो आंसू आना और ओंठों का बोल न पाना बिल्‍कुल सहज प्रक्रिया है।
        इसमें सब कल्‍पनाओं की रवानगी अपना रस अथवा तिश्‍नगी घोलती है तो वही कविता बनती है या रचना की कोई भी विधा। जो सबको लुभाती है, वही विचारों को संपन्‍नता और शिखर की ओर तेजी से परवान चढ़ाती है। इसलिए सब रचनाकार मन को नमन करते हैं और उससे मनमाफिक हासिल करते हैं।

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