शब्‍द विमर्श का छत्‍तीसवां आंकड़ा (कड़ी) : प्रेम

13 फरवरी

शब्‍द विमर्श कड़ी छत्‍तीसवीं :

प्रेम

भक्‍तगण प्रसन्‍न रहें और सुविचारों से समृद्ध हों तथा धार्मिक दोहन से बचे रहें तथा विचारों के दोहन में जुटे रहें।


एक आवश्‍यक सूचना :
अविनाश वाचस्‍पति ऊर्फ अन्‍नास्‍वामी का एक स्‍वतंत्र हिंदी चिट्ठा (ब्‍लॉग) ‘शब्‍द विमर्श’ के नाम से उपलब्‍ध है। यह आज की ताजा कड़ी है। वैसे इसमें फेसबुक की अब तक की सभी कडि़यों को भी प्रकाशित किया जाएगा। जिससे फेसबुक पर जिनका खाता नहीं है, वे भी और जिनका खाता है वे भी, मतलब सब वहां …और यहां पर आकर इन प्रवचनों/विमर्श का …………लाभ ले पाएंगे। विमर्श दोनों ही स्‍थलों पर जारी रहेगा।
फेसबुक महात्‍मय पुस्‍तक का एक तिहाई अंश तैयार है। इसे भी संशोधित किया जाएगा फिर भी अगर आप जानना चाहते हैं कि उनमें किन साथियों की टिप्‍पणियों को शामिल किया गया है तो एक ई मेल भेजें।

अन्‍नास्‍वामी प्रवचन श्रंखला की छत्‍तीसवीं कड़ी :

आज ‘शब्‍द विमर्श’ की यह कड़ी अपने पैंतीसवें पड़ाव पर पहुंच चकी है। यदि आप इस बारे में कुछ कहना चाह रहे हैं तो अवश्‍य कहें, मैं आपके विचारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हूं।

‘शब्‍द विमर्श’ कड़ी छत्‍तीसवीं :

प्रेम

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10 Responses to “शब्‍द विमर्श का छत्‍तीसवां आंकड़ा (कड़ी) : प्रेम”

  1. संतोष त्रिवेदी फ़रवरी 13, 2012 at 10:30 अपराह्न #

    आज से पहले न था
    दिल में ,नहीं बाज़ार में ,
    बौरा गया हर आदमी
    अब अचानक प्यार में…!

    • DrcaptAlok Ranjan फ़रवरी 14, 2012 at 3:49 पूर्वाह्न #

      संतोष जी ,आप मानवीय भावनाओं को बाजार में बेचंगे चाहे वह प्रेम हो या कुत्सा ,मूल्य आपको ही चुकाना होगा ,’प्रेम से बढ़कर कोई पूजा नहीं’ भी हमी गाते हैं और प्रेमियों को सूली पर भी हमी लटकाते हैं |समाचार बेचने वाले पूरी तैयारी से पूरे सप्ताह प्रेम को भुनाते रहे और आज शाम दो दाएँ पक्ष वाले और दो बाएँ पक्ष वालों को बुला ,महाबहस भी करवा देंगे हो सकता है कुछ तोता -छाप ज्योतिषियों को भी मौका मिले|
      प्रश्न यह नहीं की प्रेम को कब और क्यों जताया जाये ,या प्रेम की विस्तृत परिभाषा क्या हो ,?यह भी नहीं की प्रेम में किन -किन कलाकारों को यथा माता -पिता,देश आदि को प्रेम मंच पर बुलाया जाये ,एक दिन से कुछ बनने या बिगड़ने का प्रश्न भी नहीं |
      मूल तत्व यह है की बाजार तभी खुला होगा जब ग्राहकों की संभावना रही होगी ,एक पक्ष गुलाब बेच रहा है ,दूसरा पक्ष ज्योतिष बाँच रहा है ,पर खरीद कौन रहा है ?गुलाब आज किस भाव में बिक रहे होंगे या लाल गुलाब की कालाबाजारी हो रही होगी ,मुझे ठीक -ठीक नहीं पता ,हाँ प्रेम बड़ा सस्ते दर पर उपलब्ध होगा ,यह विश्वास है मुझे |
      ना प्रेम बुरा है ना उसकी अभिव्यक्ति ,किसी दिन से क्या प्रयोजन और क्या विरोध,कम से कम जाति-प्रथा के अंत के लिए यही मार्ग दिखता है ,पर प्रेम अल्पकालीन नहीं दीर्घ और गहरी ,सहज अभिव्यक्ति है ,अन्य दिखावा या आकर्षण ,यह बात समझनी होगी हमें और अपने किशोर बेटे -बेटियों को समझाना भी होगा हमें,फिर १४ या १५ इन तारीखों से कोई मतलब नहीं होगा ,यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है ,कठिन मामला है ,पर हल हमी को निकला होगा –

      “कहते है, धरती पर सब रोगॉ से कठिन प्रणय है,
      लगता है यह जिसे, उसे फिर नीन्द नही आती है ,
      दिवस रुदन मॅ, रात आह भरने मॅ कट जाती है.
      मन खोया-खोया, आंखॅ कुछ भरी-भरी रहती है,
      भींगी पुतली मॅ कोई तस्वीर खडी रह्ती है ,
      सखी उर्वशी भी कुछ दिन से है खोई-खोई सी ,
      तन से जगी, स्वप्न के कुंजॉ मॅ मन से सोई-सी,
      खड़ी-खड़ी अनमनी तोड़्ती हुई कुसुम-पंखुड़ियाँ,
      किसी ध्यान मॅ पड़ी गँवा देती घड़ियॉ पर घड़ियाँ,
      दृग से झरते हुए अश्रु का ज्ञान नही होता है ,
      आया-गया कौन, इसका कुछ ध्यान नही होता है ,
      मुख सरोज मुस्कान बिना आभा-विहीन लगता है
      भुवन-मोहिनी श्री का चन्द्रानन मलीन लगता है.,
      सुनकर जिसकी झमक स्वर्ग की तन्द्रा फट जाती थी,
      योगी की साधना, सिद्ध की नीन्द उचट जाती थी.
      वे नूपुर भी मौन पड़े है,निरानन्द सुरपुर है,”-उर्वशी से

      • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 14, 2012 at 11:20 पूर्वाह्न #

        प्रेम सिर्फ प्‍यार ही नहीं है। किसी की निंदा में भी प्रेम झलकता है। किसी की प्रेमवश पिटाई भी की जाती है। प्रेम कई कई दिन तक भूखा रख सकताह ै तो व्‍यक्ति प्रेम में कई कई दिन तक लगातार खा भी सकता है। प्रेम दरअसल दीवानापन है। इस दीवानेपन में जो अपनापन है, उसी के कारण इसमें धोखे भी होते हैं। इसमें सच्‍चे भी होते हैं। प्रेम पर सभी विधाओं में लिखा गया है। प्रेम का फलक बहुत व्‍यापक है, प्रेम सबके लिए लक है। एक अलख है प्रेम। सच्‍चा जन्‍म है प्रेम। प्रेम से बड़ा कोई नहीं और छोटा भी कुछ नहीं। प्रेम नि:संदेह प्रेम ही है। धर्म, श्रद्धा, आस्‍था से बहुत ऊपर है प्रेम आलोक जी।

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 14, 2012 at 11:30 पूर्वाह्न #

      आदमी आज नहीं बौराया है। सृष्टि के आरंभ से ही बौराया घूम रहा है। कभी सेब लेकर और कभी फलों के फल को लेकर। अचानक कुछ नहीं होता है। यह बौर आजकल के मौसम में अपने पूरे उफान पर होता है। बौर आमों में भी आया करते हैं और कोयल की कूक से महक जाया करते हैं। जब तक संतोष है तब तक सब धन धूरि समान, सिर्फ प्रेमधन इसका अकेला अपवाद है संतोष भाई।

  2. janimurari फ़रवरी 13, 2012 at 10:38 अपराह्न #

    badhiyaa hai…

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 14, 2012 at 11:27 पूर्वाह्न #

      बढि़या आप मुरारी जी, चिट्ठे को कह रहे हैं विमर्श को कह रहे हैं या कह रहे हैं आज के बाजारीकरण के जंगल में खो चुके प्रेम को। अगर आप अपनी जिज्ञासा स्‍पष्‍ट करते तो उसी के अनुरूप इस पर टिप्‍पणी की जाती। जैसी कि टिप्‍पणी के अनुरूप प्रतिक्रिया दी गई है।

  3. कुमार आदित्‍य फ़रवरी 14, 2012 at 1:15 पूर्वाह्न #

    जैसो बंधन प्रेम कौ, तैसो बंध न और
    प्रेम का अर्थ है किसी अस्तित्व को इस कदर टूटकर चाहना कि उसके अस्तित्व में ही अपनी हर ख्वाहिश का रंग घुलता हुआ महसूस हो। यही प्रेम है जो रामकृष्ण ने मां शारदामणि से किया, यही वह प्रेम है जिसने राधा-कृष्ण को विवाह बंधन में न बंधने के बाद पूज्य बना दिया। प्रेम परमेश्वर का रूप है, एक समर्पण है, यहां आकर्षण का लेशमात्र भी नहीं। जीवन में प्रेम आते ही आत्मीयता, सहकारिता और सेवा की उमंगें खुद-ब-खुद हिलोंरे मारने लगती है। जैसे-जैसे प्रेम पवित्र होता है, वैसे-वैसे प्रेमी अपने प्रियतम (आराध्य) के हृदय में समाता चला जाता है, तभी तो मीरा, सूर, कबीर जैसे प्रेमियों का जन्म होता है। सच्ची श्रद्धा की परिणति है प्रेम और यह पवित्रता से पूर्ण होता है।
    प्रेम की खुशबू से वातावरण महक रहा है। प्रकृति का कण-कण प्रेमासिक्त हो अपने देवता के चरणवंदन कर रहा है। इसी बीच ‘वेलेंटाइन डे’ का आना मानो ऐसा लगता है कि यह सब सदियों से निर्धारित रहा होगा। लेकिन ‘वेलेंटाइन डे’ का इतिहास तो ज्यादा पुराना नहीं है! हां परंतु इस दिन के साथ जुड़ा शब्द ‘प्रेम’ सृष्टि की उत्‍पत्‍ति के साथ ही उत्पन्न हुआ और इसके खात्मे पर ही अलविदा होगा। यही वह शब्द है जिसके सहारे प्रेमी, परमात्मा को प्रकृति के कण-कण में महसूस करने लगता है। उसे कुछ भी पराया नहीं लगता, वह बन जाता है सम्पूर्ण विश्व का मित्र। सबका दुःख दर्द उसे अपना लगने लगता है।
    परंतु बदलते वक्त ने जीने के मायने बदल दिए। ऐसे में सोच, संबंध और मूल्यों का बदलना तो जायज़ ही था। अब इस बदलते दौर में प्रेम भी कैसे अछूता रहता। बदल गया मन की वीणा का राग। कहानी, कविताओं, उपन्यासों और पुरानी फिल्मों में देखा गया प्रेम गुजरे जमाने की बात हो गया। प्रेम अब भावना नहीं रहा। वैश्वीकरण की संस्कृति ने ‘प्रेम‘ को हृदय से निकालकर चैाराहे पर ला पटका और प्रेम गमले में उगने वाले उस पौधे सा गया, जिसे गिफ्टस, डेटिंग, कामना और वासना के पानी से प्रतिपल सींचना पड़ता है। नहीं तो वह मुरझा जाएगा। खो गई प्रेम की गहराई और इसकी गरिमा। प्रेम की पवित्रता का लोप हो गया और यह बन गया सिर्फ एक ‘वेलेंटाइन डे’ को सफल बनाने का जरिया। वर्तमान की तेज दौड़ने वाली जि़दगी में प्रेम की दुकानें सजने लगी। जहां प्रेमोपहारों के नाम पर लोगों को ठगा जाने लगा। धीरे-धीरे प्रेम मशीनी हो चला। जिन मानवीय संबंधों की दुहाई देते हम थकते से नहीं थे। उन एहसासों के स्तर पर हमने सोचना बंद कर दिया। प्रेम में सर्वस्व अर्पण करने की परंपरा विलुप्त होने लगी और प्रेम लड़ने लगा अपना अस्तित्व बचाने के लिए। प्रेम आकर्षण से आकर देह पर टिक गया है और सामने आया प्रेम का विकृत रूप। प्रेम फैशन बन गया। इसी कारण ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन हजारों ऐसी खबरें सुर्खियां बनती हैं जो हमें सोचने को मजबूर करती हैं कि हम किस दलदल में फंसते चले जा रहे। बाजारीकरण के युग में प्रेम भी बाजारू हो चला है। प्रेम के लिए ऐसा कहना शर्मनाक है लेकिन यर्थाथता यही है। एलिजाबेथ बैरेट ब्राउनिंग अपने प्रेमी को एक पत्र में लिखती हैं- अगर मुझे तुम प्यार करना चाहते हो तो सिर्फ प्यार करो, किसी और चीज के लिए नहीं। यह मत कहो कि…मैं उसकी मुस्कराहट को प्यार करता हूं…उसके रूप को…उसके बोलने के नर्म अंदाज को, क्योंकि ये विचार किसी खास दिन मेरे विचारों के साथ बड़ी खूबी से समन्वित हो उस दिन को खूबसूरत बना सकते हैं-लेकिन मेरी जान ये सब चीजें बदल भी सकती हैं और प्रेम को नष्ट भी कर सकती हैं या नहीं भी। ब्राउनिंग का यह कहना सर्वथा उचित है क्योंकि दैहिक प्रेम को कब तक जिया जा सकता है। ऐसा प्रेम देह की सुंदरता समाप्त होते ही समाप्त हो जाएगा। काश! ये बदले जमाने का प्रेम धरती पर उगने वाला वटवृक्ष बन, पाताल तक अपनी जडे़ं पहुंचा पाता और जन्म-जन्मांतरों तक अटल-निश्चल इस धरा की शोभा बढ़ता।
    आज के इस भौतिकतावादी युग में संवेदना और विश्वास की परिपाटी का लोप हो रहा है और प्रेम का भरे बाजार वासना और कामना के हाथों चीरहरण हो रहा है, ऐसे में जरूरत है बदलाव की। जो प्रेम को बाजारी चमक-दमक में खोने से बचा ले। हम प्रेम में निहित संवेदना, गरिमा और इसकी आंतरिक गहराई को पहचानें। जिस दिन हम सब प्रेम का असली मर्म समझ लेंगे, उसी दिन से मनुष्य अपनी संकीर्णताओं से निकलकर बिना शर्त के प्रेम करेगा। तभी धरती भी प्रेम के रस में डूबकर नृत्य कर उठेगी और बंजर होती प्रेम की खेती हो हम बचा सकेंगे। ऐसे में सार्थक होंगी कविवृंद की ये पक्तियां-जैसो बंधन प्रेम कौ, तैसो बंध न और।
    मेरा यह आर्टिकल अमर उजाला काम्‍पेक्‍ट में 14 फरवरी को पृष्‍ठ 12 संपादकीय में प्रकाशित हुआ है। http://compepaper.amarujala.com/svww_index.php

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 14, 2012 at 11:25 पूर्वाह्न #

      आदित्‍य जी, प्रेम धन के सामने सब धन धूल है। और करेंसी धन के लिए सब आंखों में धूल झोंकते हैं जबकि प्रेम धन के लिए माता-पिता और स्‍वजनों की आंखों में। कई बार तो अभिभावक भी आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं पर इससे यह न समझ लिया जाए कि वे आपके क्रिया कलापों से परिचित नहीं होते हैं। वे सब उन अनुभवों से गुजर चुके होते हैं। उन अहसासों को स्‍मृति में संजोए होते हैं। उनका लाभ वे अपनी संतान को देना चाहते हैं पर संतान उन्‍हें अपना दुश्‍मन मान बैठती है और ताना मारने और धोखा देने से भी नहीं चूकती है। इस सब का परिष्‍कार होना चाहिए। राह बहुत कठिन है पर किसी को तो इस नेक राह पर चलने की शुरूआत करनी ही होगी। किसी को तो उम्‍मीदों का सूरज जगाना होगा। आदित्‍य का आलोक चहुं ओर मन और मानस में बिखराना होगा।
      जैसा दिव्‍य अहसास आज हम करने का मुगालता पाले बैठे हैं। वह सिर्फ आज ही क्‍यों, क्‍यों नहीं हर पल प्रत्‍येक पल यह सबके मनों में नहीं मिलता है। होता है पर हम इसे बाहर आने नहीं देते। जब बाजार सज जाता है त‍ब हम भी इसमें शामिल हो जाते हैं। बिना खर्च किए हमें आनंद नहीं मिलता है। फ्री का आनंद अब बीते जमाने की तरह बिसरा दी गई है। मन का आनंद कहीं लुप्‍त हो चुका है। आज सबसे अधिक आनंद इस दिन धंधा करने वालों ने उठाया होगा। प्रेम भी धंधे का पर्याय बन गया है। जरा मन में झांक कर देखिए, मैं कहीं गलत कह रहा होऊं, तो अवश्‍य आपत्ति दर्ज कीजिए, मुझे हर्ष होगा।

  4. Aman Kumar Tyagi फ़रवरी 16, 2012 at 9:44 पूर्वाह्न #

    प्रेम अनुभव की वस्तु है, लिखने अथवा कहने की नहीं। प्रेम का कोई विकल्प नहीं होता। प्रेम के बिना सब व्यर्थ है।

    • avinashvachaspatiannaswami फ़रवरी 16, 2012 at 8:39 अपराह्न #

      अमन जी, निश्चित ही प्रेम अनुभव की वस्‍तु है परंतु अपने अनुभवों से हम अन्‍यों को सतर्क कर सकते हैं और उन अनुभवों का लाभ सिर्फ विवेकवान ही ले पाते हैं। प्रेम में जो दीवानापन है, उसमें इस तरह की सतर्कताएं काम नहीं आती हैं परंतु इनका ध्‍यान अवश्‍य रखा जाना चाहिए। प्रेम में लिखा और कहा गया अपना सच्‍चा अनुभव हो तो उससे मानवजाति को लाभ ही मिलता है। बशर्ते कि उसमें अपनी कारीगरी न दर्शाई गई हो और बात को बेवजह तूल न दिया गया हो। प्रेम से ही परिवार है, समाज है, संसार है और प्रेम का दुश्‍मन ही सारा समाज, परिवार और संसार है – इसमें यही विरोधाभास इसकी विशिष्‍टता को अपनी संपूर्णता में दिखलाता है।

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